एक किताब की कहानी
क्या बेवजह बढ़ रहें हैं ये क़ाफ़िले कौन सी है वो मंज़िल चल पड़े जिस रास्ते कुछ तो होगा मसला-ए-जुनून छिड़ गया है इंक़लाब जिस के वास्ते कितना और रुकें के जब होगी वो सुबह छीनी आज़ादी जिस लिए फ़िरंगी…
Poet | Author | Marketer
क्या बेवजह बढ़ रहें हैं ये क़ाफ़िले कौन सी है वो मंज़िल चल पड़े जिस रास्ते कुछ तो होगा मसला-ए-जुनून छिड़ गया है इंक़लाब जिस के वास्ते कितना और रुकें के जब होगी वो सुबह छीनी आज़ादी जिस लिए फ़िरंगी…